कितना मीठा सा शब्द है नानी
माँ की माँ होती है नानी
नानी के किरदारों से बुनी हुई कहानी
पता नहीं कैसे याद रहती थी उनको मुँह जुबानी I
मम्मी की डाँट पर हमसे ज़्यादा ध्यान
चुप करादे उनको खींच के उनके कान
घर में घुसते ही तैयार रहता खाने का सामान
चेहरा देखकर तबियत का लगा लेती अनुमान I
आती सूरजगढ़ की बहुत बहुत याद
ताज़ा है सारी बातें इतने दिनों के भी बाद
नानी की पहली रोटी बनती गऊ माता का प्रसाद
सुबह उठकर पहले सूरज की घंटी और पूजा पाठ I
अँधेरे में cosy सी कोठरी थी खास,
न समझ आया उसमे नानी की तिजोरी का राज़
बिल्ली को रोटी और ख़तम करके घर के काम काज
नानी रहती lantern जलाये, गोंद के लड्डू के साथ I
बगल में थी रसोई, चूल्हे की रोटी क्या कमाल!!!
और कोयले पे सिलगती देगची की दाल
रात को छत पे हमारे लिए माचा डाल
लपेटती हम बच्चो को ले लोई और शॉल I
राजा की तरह हमे सर पे चढ़ाना
नज़र से बचाने के लिए झाड़ा लगवाना
मिटटी से बीड़ में छोटे छोटे घर बनाना
फिर अपने पैरो से रेत को छुड़ाना I
हर त्यौहार पर सुन्दर सी मेहँदी लगवाना
नानाजी की दुकान पे 1 रुपया रोज़ लेने जाना
पित्रों के नाम से पैंडे में पानी चढ़ाना
“नानी घर आकर बिगड़ के बारा बाँट के हो गए”
ये सुन मम्मी की डाँट खाना I
याद आता है आपका मामा को आँख दिखाना
हमे परेशान करने पर उनको धमकाना
आपका वो हमे कोने में ले जाकर समझाना
की ये बात घर जाकर दादी को मत बताना I
ये मत कहना की पानी handpump से लाये थे
Light न होने पर हाथ वाले पंखे चलाये थे
ये भी न बताना की कहाँ कहाँ चोट खायी थी
और नानी ने कब कब कुल्फी नहीं खिलाई थी I
सच बोलू नानी सबसे प्यारी आपकी परछाई थी
तारों के नीचे AC तो नहीं था पर नींद बहुत अच्छी आयी थी
आपसे सही मायने में सादगी सिखाई थी
किताबो से बेहतर आपके संस्कारो की पढ़ाई थी
बचपन का सबसे प्यारा हिस्सा होता है ननिहाल
कुछ special ही होती है देखभाल
जब भी मामा मामी को करती कॉल
कब आओगी बेटा सूरत , यही रहता है सवाल ?
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